उम्र पचास-बावन के आस-पास होगी. सिर पर ढेर सारे कच्चे-पक्के बाल. बुद्धिजीवियों वाली दाढ़ी के मालिक. कुर्ता खद्दर वाला. कुर्ते के साथ ज्यादातर जींस धारण करते हैं. कुर्ते और जींस में देखकर लगता है जैसे समाज को याद दिला रहे हों; "मैं ऐसा ही हूँ. स्थापित मान्याताओं को पूरी तरह से ध्वंस करने वाला. फिर वो चाहे कपड़े धारण करने की विशेष प्रक्रिया से हो या फिर दाढ़ी रखने से". सुमन नाम है. इनके 'लड़के' इन्हें सुमू दा कहकर पुकारते हैं. करीब डेढ़ सौ 'लड़को' की फौज है इनकी. लोग बताते हैं कि सत्तर के दशक में फुलटाइम नक्सली थे. पुलिस इनकी तलाश में रहती थी. उन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री इनसे डरते थे. उन दिनों लाकअप में धुनाई के किस्से मुहल्ले के क्लब द्वारा प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका में अभी भी लिखते हैं. शायद अपने 'लड़कों' को प्रेरणा देने के लिए.
खूब पढ़ाई की है. सेमिनार वगैरह आयोजित करने का का काम बखूबी जानते हैं. सेमिनार के मोशन के लिए हेडलाइन लिखने में महारत हासिल है. इलाके की दीवारों पर नारे लिखकर साम्राज्यवाद का नाश इन्ही की देख-रेख में होता है. बात करते हैं तो लगता है कविता कह रहे हों. क्लब क्या होता है और उसके सहारे साम्यवाद कैसे लाया जाता है, इलाके के लोगों को इन्होने ही बताया. ज्यादातर क्लब में बैठे रहते हैं और वहाँ रखे कैरमबोर्ड से बतियाते रहते हैं. नारे लिखने में माहिर. लोग बताते हैं इनके लिखे नारे सोवियत रूस तक पढ़े जाते थे. विश्व साहित्य पर बड़ी जोरदार पकड़ है. जब क्रांतिकारी साहित्य की बात करते हैं तो लगता है जैसे तमाम क्रांतिकारी लेखकों और कवियों लिखा हुआ इन्होने डायरेक्ट पाण्डुलिपि से पढ़ लिया था. तकरीरों में भाषा के इस्तेमाल को लेकर घंटो बहस कर सकते हैं. लेनिन ने २१ अक्टूबर, १९२० को चार बजकर बीस मिनट पर किससे क्या कहा था, इन्हें जुबानी याद है. कुल मिलाकर युवा क्रांतिकारियों को कंट्रोल करने वाले 'अनुभवी' क्रांतिकारी.
लेकिन उनका ये चेहरा दिखाने के लिए है. डराने के लिए एक और चेहरा है इनके पास. अपने दिखाने वाले चेहरे का मुखौटा अक्सर बायीं जेब में रखते हैं. जरूरत पड़ने पर निकाल कर पहन लेते हैं. ऐसा नहीं है की जरूरत कभी-कभी पड़ती है. चुनाव न भी हों तो भी पाड़ा (मोहल्ला) में 'गरीबों' के उत्थान के लिए या फिर दुर्गा पूजा के लिए चंदा इकठ्ठा करते हुए कई बार इनके डराने वाले चेहरे को देखा जा सकता है. साथ में आम आदमी के डरे हुए चेहरे को भी. जो इन्हें जानते हैं वे इनसे डरते हैं. सबको इस बात की चिंता रहती है कि बात करते-करते पता नहीं कब मुंह से कविता की सप्लाई बंद हो जाए और गाली की सप्लाई शुरू हो जाए. नुक्कड़ सभाओं में कई बार विपक्षियों की आलोचना करते-करते थक जाते हैं तो गाली-फक्कड़ शुरू कर देते हैं. जानकार बताते हैं कि पाँच-सात साल में एमएलए पद के उम्मीदवार साबित हो सकते हैं.
आज सुबह मिल गए. मैंने पूछा; "सुमन दा, कैसे हैं? पिछले दस दिनों से दिखाई नहीं दिए. क्लब में भी नहीं दिखे. कहीं गए थे क्या?"
बोले; "हाँ हाँ. पंचायत इलेक्शन था न. हमारा ड्यूटी इस बार बहरमपुर में था. हम अपना लड़का लोगों के साथ उधर ही था. इसलिए दिखाई नहीं दिया. तुम कैसा है?"
मैंने कहा; "मैं ठीक हूँ."
इतना कहकर मैं चल दिया. उनकी बात सुनकर मुझे याद आया कि रविवार को बहरमपुर में पंचायत चुनावों के दौरान हुई हिंसा में बीस लोग मारे गए.
चलते-चलते
ऐसा बहुत कम होता है कि मंत्री और नेता दुखी हो जाएँ. और ऐसे मंत्री जिनकी पार्टी तीस सालों से शासन में दही की तरह जम जाए, उसके दुखी होने का क्या कारण हो सकता है? लेकिन हमारे प्रदेश की सरकार के एक मंत्री श्री क्षिति गोस्वामी हाल में ही बहुत दुखी दिखाई दिए. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपने दुःख के बारे में बताया. गोस्वामी जी इस बात से दुखी थे कि उनकी पार्टी, आर एस पी के कार्यकर्ताओं के पास पंचायत चुनावों में इस्तेमाल के लिए केवल हाथ से बनाए गए बम हैं. जब कि सरकार में सबसे बड़ी पार्टी सी पी आई (एम) के कार्यकर्ताओं के पास लाईट मशीनगन, पिस्तौल, रिवाल्वर वगैरह हैं. उनकी इस बात को सुनकर मेरा क्या मानना है वो मैं आपको बताता चलूँ.
मुझे लगा तीस साल तक शासन में रहकर ये साम्यवादी जब चुनावों के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों के मामले में साम्यवाद नहीं ला सके तो समाज में साम्यवाद कैसे ले आयेंगे? दिल्ली दूर लग रही है. नहीं?
आज से ठीक एक साल पहले मैंने अपने ब्लॉग पर पहली पोस्ट लिखी थी. एक साल हो गए जब मैंने ये सोचकर लिखना शुरू किया था कि देवनागरी कंप्यूटर पर लिखना कठिन है तो क्या हुआ, मैं रोमनागरी में ही लिखूंगा. लिखते-लिखते एक साल बीत गया. एक साल तक मुझे झेलने के लिए सभी मित्रों को नमन.
Wednesday, May 21, 2008
सुमू दा
Saturday, May 17, 2008
दुर्योधन की डायरी - पेज २९२० और २९२६
दुर्योधन की डायरी - पेज २९२०
पिछले पन्द्रह दिनों से चिंताग्रस्त हूँ. चारों तरफ़ से शिकायत आ रही हैं. गुप्तचर बता रहे हैं कि प्रजा के बीच मेरी छवि कुछ ख़राब हो गई है. लोग कह रहे हैं कि कुछ मेरे कर्मों की वजह से और कुछ दु:शासन और जयद्रथ की गुंडागर्दी की वजह से मेरी छवि को धक्का पहुंचा है. वैसे तो मामाश्री ने समझाया कि एक राजपुत्र को ऐसी सूचनाओं को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है लेकिन कुछ तो करना पड़ेगा जिससे छवि सुधरे. कर्ण ने सुझाव दिया कि मैं प्रजा के बीच जाकर उनसे मिलूं. हो सके तो उनके घर खाना खाऊं और रात को वहीं पर विश्राम करूं. अगर इतना नहीं कर सकता तो कम से कम नगर के सर्किट हाऊस में सप्ताह में दो घंटे तो जनता दरबार लगा ही सकता हूँ. लेकिन मैंने तो हाथ उठा दिया. ये मेरे बस की बात नहीं है.
पिछले हफ्ते ही एक 'ईमेज डेवलपमेंट एजेन्सी' से बात चलाई थी. लेकिन इनलोगों के बड़े नखरे हैं. मुझे मेरा हुलिया बदलने का सुझाव दे रहे थे. ऊपर से कह रहे थे कि मुझे अपना रथ और सारथी तक बदलने की जरूरत है. इन्हें कौन समझाये कि वर्षों से मेरे लिए सारथी का काम कर रहे सेवक को मेरे बारे में कितनी जानकारियां रहती हैं. उसके पास मेरे किए गए कर्मों का पूरा रेकॉर्ड रहता है. कल को मैं उसे नौकरी से निकाल दूँ और वो किसी न्यूजपेपर से पैसे लेकर मेरी जानकारी बेंच डाले तो मेरी तो ईमेज और ख़राब हो जायेगी. आगे चलकर मुझे राजा बनना है. भविष्य में कोई न्यूजपेपर मेरे कर्मों की सूची फैक्स करके मुझे ही ब्लैकमेल कर सकता है.
चार दिन पहले दोपहर में लंच के बाद जब हमलोग तीन पत्ते खेल रहे थे तो मैंने मामाश्री के साथ एक बार फिर बात चलाई. लेकिन मुझे लगा जैसे वे सीरियस नहीं हैं. कहने लगे कि मुझे अपनी ईमेज को लेकर इतना चिंतित होने की जरूरत नहीं है. राजपुत्र की ईमेज अगर अच्छी रहे तो प्रजा उसे शक की निगाह से देखती है. वैसे तो मैं मामाश्री की बात कभी नहीं काटता लेकिन इस बार जब मैंने कहा कि उन्हें मेरी ईमेज के बारे कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा तो उन्होंने मुझे सुझाव दिया. बोले राजपरिवार के सदस्य के लिए अपनी ईमेज ठीक करने का सबसे बढ़िया तरीका है प्रजा से संवाद स्थापित करना जिससे प्रजा को लगे कि वे उनके बीच रहते हैं. जब मैंने उनसे कहा कि ये मेरे बस की बात नहीं है तो उन्होंने इसका एक रास्ता निकाल लिया. उन्होंने सजेस्ट किया कि मैं नगर में कई जगह अपनी प्रतिमा स्थापित करवा लूँ. प्रतिमा अगर प्रजा के बीच रहेगी तो प्रतिमा देखकर प्रजा को लगेगा कि मैं उनके बीच ही हूँ.
मुझे मामाश्री की बात खूब जमी. मैंने अभी खुश होकर हँसना शुरू ही किया था कि दु:शासन की बात ने मेरी हँसी रोक दी. दु:शासन का कहना था कि नगर के किसी हिस्से में अभी तक पितामह और पिताश्री की एक भी प्रतिमा नहीं है. ऐसे में अगर मैं अपनी प्रतिमा स्थापित करवा देता हूँ तो प्रजा को लगेगा कि मैं बहुत ऐरोगेंट हो गया हूँ. मेरी ईमेज और भी ख़राब हो जायेगी. मुझे दु:शासन की बात पर आश्चर्य हुआ. आजकल कभी-कभी इंटेलिजेंट बात कर देता है. उसकी बात में दम था. लेकिन जब मामाश्री साथ हों तो कोई भी समस्या तुरंत हल न हो, ऐसा नहीं हो सकता. उन्होंने दु:शासन की इस शंका का तुरंत निवारण किया. मामाश्री ने धाँसू आईडिया दिया. उनका कहना था कि ऐसी समस्या से निपटने के लिए सबसे अच्छा होगा कि हम सबसे पहले पिताश्री की एक प्रतिमा नगर की बीचों-बीच किसी जगह लगवा दें.
दुर्योधन की डायरी - पेज २९२६
मामाश्री ने सुझाव तो दे दिया कि अपनी प्रतिमा स्थापित करने से पहले मैं पिताश्री की प्रतिमा नगर के बीच में कहीं स्थापित करवा दूँ. लेकिन बहुत खोज के बाद भी नगर में कहीं भी खाली जगह नहीं मिली. परसों पूरे दिन भर नगर पालिका के अफसर घूमते रहे लेकिन खाली जगह कहीं नहीं मिली. ऐसे में मामाश्री एक बार फिर से संकटमोचक बनकर उभरे. उन्होंने सुझाव दिया कि नगर के बीच जो चिल्ड्रेन पार्क है उसे तोड़कर पिताश्री की प्रतिमा स्थापित की जा सकती है. कल ही मजदूरों को लगाकर चिल्ड्रेन पार्क ध्वस्त करना था लेकिन जब मजदूर वहाँ पहुंचे तो प्रजा ने विरोध शुरू कर दिया. ऐसे में अश्वत्थामा को भेजना पड़ा और उसने अश्रुबाण का प्रयोग कर भीड़ को तितर-वितर किया. बड़ा झमेला है. एक राजा प्रजा से ख़ुद को जोड़ने के लिए अपनी प्रतिमा स्थापित करना चाहे तो भी लोग अड़ंगा लगा देते हैं. दोपहर को ही काम शुरू हो सका लेकिन संतोष की बात ये रही कि मजदूरों ने पूरी रात काम करके पार्क को ध्वस्त कर दिया.
आज ही मूर्तिकार आकर पिताश्री का नाप ले गया है. जल्दी ही पिताश्री की मूर्ति बनकर आ जाए तो उसकी स्थापना का काम शुरू करवाऊँ. आज ही नगर पालिका के अफसरों को बोलकर स्पोर्ट कॉम्प्लेक्स और हॉस्टल तुड़वाने का ऑर्डर निकलवा दिया है. मैंने फैसला किया है कि वहाँ मैं अपनी प्रतिमा स्थापित करवाऊंगा.
पुनश्च:
सुनने में आया है कि एक बुक पब्लिशर दो दिन पहले ही पितामह से मिला है. मेरा सबसे तेज गुप्तचर बता रहा था कि पितामह अपनी बायोग्राफी लिखना चाहते हैं. बीच में उड़ती हुई ख़बर सुनी थी कि उन्होंने अपना जीवन वृत्तांत लिखना शुरू भी कर दिया है. पता नहीं क्या-क्या लिखेंगे. बुजुर्ग लोगों के साथ यही समस्या होती है. जीवन भर जो कुछ भी करेंगे उसके बारे में बुढापे में लिखेंगे. लेकिन उन्हें ये भी समझना चाहिए उनके इस कर्म की वजह से बाकी के लोग भी तो लपेटे में आ जाते हैं.
Thursday, May 15, 2008
दार्शनिकता का गमछा
कुर्सी पर बैठे कुछ सोच रहे थे. थोडी देर बाद दोनों हाथों की दसों उंगलियाँ बालों में घुसा कर सिर नीचा कर कुछ सोचने लगे. फिर कुछ आश्वस्त से होते पेंसिल उठा ली. कागज़ पर कुछ लिखा. फिर उसे पेंसिल चलाकर खारिज कर दिया. फिर पेंसिल के पिछले हिस्से को दांतों तले दबा छत की सीलिंग देखने लगे. थोडी देर में चेहरे पर संतोष के भाव उमड पड़े. सिर हिलाया, मानो कह रहे हों, "हाँ, ये ठीक है." उसके बाद पेंसिल को कागज़ पर फिर चला दिया. मुझे लगा कि इस बार जो भी लिखा, उससे आश्वस्त होंगे. लेकिन ये क्या? फिर से पेंसिल से काट दिया. मैं उनके सामने बैठा ये सब देख रहा था. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि एक पत्रकार ऐसी कौन सी लाइन लिखना चाहता है जो जम नहीं रही?
मैंने उनसे पूछा; "क्या हुआ? किस उलझन से पीड़ित हो? सिर्फ़ एक लाइन लिखना है, और वो भी तुम लिख कर खारिज कर दे रहे हो. किस लाइन की तलाश है जो इतने परेशान हो? पत्रकार को एक लाइन के लिए इतनी मशक्कत करते कभी नहीं देखा."
बोले; "यही तो बात है न. पत्रकार लाइन के लिए मशक्कत नहीं करता. लेकिन जब पत्रकार को दार्शनिक बनना पड़े तो मशक्कत करनी ही पड़ती है."
मैंने उनकी तरफ़ आश्चर्य से देखा. मुझे लगा ये दार्शनिक क्यों बनना चाहते हैं? मैंने उनसे पूछा; "ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई जो दार्शनिक बनने की जरूरत पड़ रही है?"
बोले; "अरे यार समझा करो. जयपुर ब्लास्ट की रिपोर्टिंग के लिए हेडलाइन गढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ." मुझे देखते हुए उन्होंने टेबल पर पड़ा कागज़ मेरी तरफ़ बढाते हुए कहा; "लो, ख़ुद ही देख लो."
मैंने कागज़ को हाथ में लिया. पढ़ना शुरू किया तो मुझे मामला समझ में आ गया. मेरे मित्र सचमुच जयपुर में हुए बम ब्लास्ट की रिपोर्टिंग के लिए हेडलाइन लिखने की मशक्कत कर रहे थे. ढेर सारी हेडलाइन पेंसिल से लिख कर काट दी गई थीं. उनमें से कुछ यूं थी;
लाल रंग में रंग गया गुलाबी शहर, जयपुर को लगी ये किसकी नज़र?
धमाकों से दहला जयपुर, शहर के लोगों की नींद काफुर
विस्फोट से दहल तो गया लेकिन डरा नहीं जयपुर
धमाकों से बेहाल जयपुर.... आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता - प्रधानमंत्री
मुझे उनकी समस्या समझ में आ चुकी थी. मैंने पूछा; "एक लाइन लिखने के लिए अगर इतनी मशक्कत करनी पड़ रही है तो रिपोर्टिंग में इतने पैराग्राफ लिखने में तो पसीने छूट जायेंगे."
बोले; "अरे नहीं यार. पैराग्राफ लिखने में कोई समस्या नहीं है. समस्या केवल हेडलाइन लिखने में है. पैराग्राफ तो कहीं से भी कॉपी पेस्ट कर देंगे."
मैं सोचने लगा इनका दोष नहीं है. आतंकवादी घटनाएं पत्रकारों को ही नहीं, और बहुत सारे लोगों को दार्शनिक बना देती हैं. नेता, जनता, विशेषज्ञ, गृहमंत्री, प्रधानमंत्री सब ऐसे समय में दार्शनिकता का गमछा गले में लपेट लेते हैं. आतंकवाद इन लोगों के लिए कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह जाती. ऐसे मौकों पर ये लोग आर्थिक विकास और निरक्षरता से आतंकवाद को जोड़ सकते हैं. भारत में फैले आतंकवाद को बोस्निया और चेचन्या से जोड़ सकते हैं. सामाजिक कारणों की पड़ताल शुरू कर सकते हैं. पूरे देश में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर सकते हैं. रेड अलर्ट घोषित कर सकते हैं.
अगर कुछ नहीं कर पाते तो वो है अगली आतंकवादी गतिविधि को रोकने का प्रयास.
Tuesday, May 13, 2008
क्या ये नौजवान आत्मविश्वास की तलाश में ये सबकुछ कर रहा था?
सिर पर ढिठाई के साथ जमे हुए कुछ बाल हर पन्द्रह-बीस दिन पर मुझे सैलून तक पहुंचा ही देते हैं. ये ढीठ थे तो जमे रहे. जिनके अन्दर ढिठाई की मात्रा कम थी, उन्हें टिकने नहीं दिया गया. किसने टिकने नहीं दिया, ये शोध का विषय है. कोई भी इस बात की जिम्मेदारी ले सकता है. सिर के रूसी से लेकर जींस (क्रोमोजोम्स वाला जींस) तक और शहर के पल्यूशन से लेकर बढ़ती उम्र तक. लेकिन आजतक किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली. इससे अच्छा तो लश्कर-ए-तैयबा वाले हैं जो किए गए खुराफात की जिम्मेदारी तुरंत ले लेते हैं.
खैर, रविवार का दिन ऐसा ही था. सैलून में घुसकर समझ में आ गया कि काफी समय लगेगा. कारण था वहाँ इकठ्ठा हुए लोग. ऊपर से बाबू दा, जो मेरे बाल काटता है (कह सकते हैं छांटता है) वो नहीं आया था. मुझे देखते ही बाकी के दो 'कारीगरों' ने आपस में धीरे-धीरे कुछ बात की. बात खत्म होने के बाद उनमें से एक मेरी तरफ़ मुखातिब होते हुए बोला; "ऊ नहीं आया है." मुझे समझ में आ गया कि इसके कहने का मतलब है; "जब भी आते हो और हम खाली भी रहते हैं तो हमसे तो बाल कटवाते नहीं हो. लो, आज भुगतो."
मैंने उनसे कहा; "कोई बात नहीं. आप काट दीजियेगा." उसने मुझे बैठने के लिए कहा. सैलून में बैठने की बाद जो सबसे पहला काम करना होता है, मैंने भी वही किया. चार-पाँच महीने पुरानी फिल्मी पत्रिका हाथ में ले ली. पिछली कई बार के सैलून विश्राम के दौरान मैं इस पत्रिका को पढ़ चुका हूँ. लेकिन सैलून में अपना नंबर आने का इंतजार करता आदमी और क्या कर सकता है? हर बार वही पुरानी पत्रिका इस आशा के साथ उठा लेता है कि शायद इस बार कोई नई रोचक ख़बर पढने को मिल जाए जो उसे पहले दिखाई नहीं दी. लेकिन ऐसा होने का चांस कम था, ये बात मुझे पता थी. खासकर तब जब यही पत्रिका मैं पहले भी तीन बार पढ़ चुका हूँ. खैर, जॉन अब्राहम से बिपाशा बसु की अनबन की ख़बर, जो मैं पहले भी तीन बार पढ़ चुका था, फिर से पढ़ना शुरू किया.
अनबन की ख़बर पर बिपाशा जी का वक्तव्य पढ़ ही रहा था कि दो नौजवान अन्दर घुसे. दोनों आधुनिकता के रंग में सराबोर. दोनों की जींस घुटनों से नीचे फटी हुई. अन्दर से पैबंद लगा कर सिली हुई. ये जींस एक फैशन धर्म के तहत फाड़ी गई है, इस महत्वपूर्ण बात की जानकारी थी मुझे. वैसे यही जींस अगर गाँव का कोई नौजवान पहन लेता तो बड़े-बुजुर्ग कानाफूसी शुरू कर सकते थे. ये कहते हुए कि; "अरे ई फलाने के घर की हालत कुछ ठीक नहीं लग लग रही. कल उनके बेटे को देखे. पूरा पैंट फटा हुआ है."
इस फटी हुई जींस के अलावा आधुनिकता के चढावे के रूप में एक कान में छोटी सी बाली, दाहिने हाथ में स्टील का कडा, बायें हाथ में चौड़ा सा चमड़े का पट्टा और बहुत बड़ा सा चश्मा जो मोटरसाईकिल चलाते वक्त पहना जाता है. अन्दर घुसते ही उनमें से एक ने 'कारीगर' को हिदायत दी; "सुन, इसको न, 'मेसी लुक' देना है. चारों तरफ़ चूल (बंगाल में सर के बालों को चूल कहा जाता है) छोटा कर देना और बीच में बडा छोड़ देना. जेल-वेल मार के मेसी लुक देना है. बाकी देख लेना, जो तुमको अच्छा लगे, कर देना." इतना कहकर वो नौजवान चला गया. जो नौजवान 'मेसी लुक' लेने आया था, वो मेरे पास ही बैठ गया.
अब चूंकि नौजवान पास बैठ गया तो मैंने भी फिल्मी पत्रिका को थोड़ा आराम दे दिया. जब असली मनोरंजन का हिसाब बैठ गया है तो इतनी बासी पत्रिका की जरूरत भी किसे है? मैंने नौजवान को देखा. करीब बीस-इक्कीस साल उम्र होगी लेकिन स्वस्थ बिल्कुल नहीं. पेट निकला हुआ. कमीज के ऊपर के दो बटन खुले हुए. बड़ा सा धूपी चश्मा हाथ में. कपड़े गंदे थे. लड़का बहुत पैसेवाले घर का था, ऐसा नहीं लगा मुझे. मैंने जिस पत्रिका को आराम दिया उसी को इस नौजवान ने उठा लिया. कुछ देर उलट- पलट कर देखा. एक पेज पर जॉन अब्राहम की तस्वीर दिखाई दी उसे. उसी तस्वीर को दिखाते हुए उसने कारीगर से पूछा; "भइया, ये जो हेयर स्टाइल है, इसे क्या बोलते हैं?"
"इसे फंकी कहते हैं"; उस 'कारीगर' ने जवाब दिया. जवाब देने के बाद शायद उसे अपनी भूल का एहसास हुआ होगा इसलिए उसने उचित संसोधन करते हुए फिर कहा; "नहीं-नहीं, ये स्पाईकी फंकी है." उसके मुंह से फंकी शब्द सुनकर मुझे जातिफलादि चूर्ण की बात याद आ गई थी.
अपने सवाल का जवाब पाकर नौजवान आश्वस्त हुआ. उसके बाद उसने जेब से सेलफ़ोन निकाला और किसी को फ़ोन किया. शायद कोई लड़की थी. उसने लड़की को जानकारी देते हुए कहा; " अभी मैं स्पार्केल में हूँ. आज लुक चेंज कराने आया हूँ. शाम को फेम में मिलते हैं." थोडी देर बाद उस नौजवान का नंबर आया. लुक चेंज करवाने के लिए वो कुसी पर बैठ गया. 'कारीगर' ने उसके कान की बाली की बड़ी प्रशंसा की. मैं दोनों की फैशनमय बातचीत पूरी तरह से एन्जॉय कर रहा था.
थोडी देर में ही मेरे बाल कट गए. मैं वहाँ से निकलते हुए सोच रहा था; 'क्या नौजवानी की 'कन्फ्यूजियाहट' इसी को कहते हैं?'... 'क्या इस नौजवान को इसकी प्राथमिकताओं के बारे में पता है?'... 'क्या फैशन की होड़ इतनी महत्वपूर्ण है कि इस दौड़ में हम वैसा दिखने की कोशिश करें जो हम नहीं हैं?'
सोचते-सोचते मुझे परसाई जी का लिखा हुआ याद आ गया. एक जगह उन्होंने लिखा था; 'आत्मविश्वास कई तरह का होता है. बल का, बुद्धि का, विद्या का, धन का ...लेकिन सबसे ऊंचा आत्मविश्वास मूर्खता का होता है.... हैं फूहड़ और ख़ुद को बताते हैं फक्कड़....और ये विश्वास भी रहता है कि सामनेवाला इन्हें फक्कड़ ही समझ रहा है.........
पता नहीं नौजवान के अन्दर किस बात का आत्मविश्वास था...या फिर वो आत्मविश्वास की तलाश में ये सब कर रहा था.


